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Wednesday, February 27, 2013

समय के दामन से कुछ कुछ मेरा सा। भाग - 1



पुरे 2 साल। और जहा रहा उस घर के सामने ही एक बोर्ड "ओशो समवेत ध्यान केंद्र ". रोज सोचता चल दू उस राह पर और पहूच जाऊ वहा . वर्ष 1993, उषानगर के उस घर की खिड़की से रोज, वह राह ताका करता था। ऐसा लगता था, वो निमंत्रण दे रही हैं।
पर नियति को कुछ और ही मंजूर था।

दादाजी की एक किताब ("समाजवाद से सावधान") ने तो ओशो से परिचय करीब 14 साल की  उम्र में करा दिया था। धार जिले के उस छोटे से गाँव में , मेरी अपनी छोटी सी दुनिया बसती थी। सामने पाठशाला, घर,मैदान, कुछ मित्र  और ढेर सारी किताबे, बस यही थी मेरी दुनिया। अचानक दादाजी का कुछ सामान देखते - संभालते समय, वो किताब मिली। लेखक/कथाकार  थे ओशो रजनीश। गलती से, पहला पन्ना पढ़ लिया, फिर क्या था। आखरी पन्ने तक कुछ सुध न रही। शायद उस उम्र में इतना आसान हुआ करता था, ध्यान में जाना।

खैर, उषानगर में हिम्मत न हुई तो मास्टर ने पुरे 6 साल बाद बुलाया। वर्ष 1999, बढ़ी हिम्मत करके बंशी ट्रेड सेण्टर पंहुचा। याद नहीं किससे मिला। उन्होंने शाम 8 बजे को ध्यान शिविर में आने को कहा। बहुत शर्मीला, शायद ही कुछ बोलने में यकीं रखने वाला, अपनी दुनिया अपनी मस्ती। ये था मैं तब। शर्मीलापन तो हद दर्जे का था। गाँव में कोई सहपाठी मित्र गर लड़की हैं और वो मिलने पहुच जाये, तो मैं पीछे दरवाजे से बाहर।  

खैर, तो मैं बात कर रहा था , मेरे प्रथम ध्यान शिविर से परिचय की। निश्चय किया, आज तो ध्यान शिविर में जाऊंगा ही। हिम्मत करके ध्यान हाल के बाहर पंहुचा भी। अन्दर देखा तो, दिल सीने से बाहर। ये जगह तो अपने लिए हैं ही नहीं बॉस। रंगीन प्रकाश में  नाचते, चीखते लड़के लडकिया। तौबा, उलटे पैर दौड़ लगाई। निचे आया तो पसीने पसीने था। जान बची तो लाखो पाए। लेकिन क्या पता था, लाखो लुटा के आया था।

ओशो ने दूसरी बार भी नहीं आने दिया, तैयार जो नहीं था। या पता नहीं, मेरा ही दुर्भाग्य।

और जब फिर आया पुरे 2 वर्ष बाद, तो जीवन ने अपनी पाठशाला में कड़वे पाठ पढ़ा दिए थे। वही मूल प्रश्न "To be or not to be" सामने था।...खैर बाकि बाते कभी बाद में। लेकिन देर तो हो ही गई थी।

आज इतना ही।