"

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Thursday, November 16, 2017

अलविदा : कुंवर नारायण

आज बहुत अच्छा पढ़ा,जिसे साहित्य कहते है, पढ़ा।  कुंवर नारायण को पढ़ा।
अभिजात्यपन से फिर आंखे चार हुई। कुहासे के पीछे छुपा, वैभव फिर याद आया। नेत्र नम है।

अपने से परिचय एक गहरा संतृप्त अनुभव देता है। अभिजात्य साहित्य आपकी अंगुली पकड़ कर, बड़े मनुहाल से ले चलता है उस पार। जीवन के आपाधापी के टुच्चे पन को कही दूर फेककर , आत्मा उजास से भरती है।

अच्छा साहित्य एक उजास भरता है। कलंकित नहीं करता। जीवन ऊर्जा को उर्ध्व गति देता है.

ध्यान का गहरा अनुभव खुद की अनुपस्थिति से पैदा होता है।

आज इतना ही।
ओके मनीषा?

Saturday, September 23, 2017

बूढ़ी होती जिन्दंगी

कभी जो थी सीने मे, आग,
वो अब पेट में धधकती हैं।
बूढ़ी होती जिन्दंगी,
कुछ यू रंग बदलती हैं।

कभी आँखों में आसमां समेटे थे हमने।
आज देह मेरी,
जमीं के टुकड़े को तरसती हैं।

कभी मौसमो के तूफान से
खेले थे हम।
आज ये आँखों से
सावन बरसती हैं।

बूढ़ी होती जिन्दंगी,
कुछ यू रंग बदलती हैं।

Sunday, February 12, 2017

Tuesday, December 20, 2016

अनुपम मिश्र: साफ़ माथे वाले समाज की आवाज़।



एक हीरो वो होता हैं, जिसे दुनिया जानती हैं। एक वो, जो इस दुनिया को जानता हैं। आदमी को आदमी बनाने की एक पाठशाला, चली गई। अनुपम मिश्र चले गए। बहुत सोचता हूँ। ये भी की क्या, हमारी परेशानिया , हमारे चिंतन का दायर , हमारे व्यक्तित्व जैसा बोना हो गया हैं. हमारे चिंतन के दायरे घर और ऑफिस के बीच के सुविधा से परे नहीं जाते। सोचता हु, कब और कभी? क्या हम अपने नल और नालियो से उठकर , नदियों और तालाबो के बारे में सोच सकते हैं.  अनुपम मिश्र को जब भी पढ़ता था, एक दिलासा वापस आता था। वो भरोसे की आवाज़ थे। ऐसी आवाज़ जो परेशान, उत्तेजित, आक्रोशित नहीं करती थी, छलावा नहीं करती थी. वरन शांत करती थी, दिलासा देती थी। वो हमारे अपने इतिहास की गूंज थे। वो इतिहास जो कभी पढ़ाया नहीं गया. वो इतिहास जिसे हासिये पे डाल दिया गया। पानी को जानने वाला एक समाज चला गया।

अनुपम मिश्र , जब भी पानी और तालाब को कभी कोई खोजने की , जानने की कोशिश करेगा, आप याद आएंगे। अपनी चिंताओं के दायरे जब भी अपने घर की दहलीज से पर जायगे, आप याद आएंगे।  बहुत याद आएंगे।


Monday, September 5, 2016

श्रीगुरवे नमः


अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 

गुरु को व्यक्तित्व से जोड़ना शायद गलत हो।  गुरु नहीं होते , गुरुत्व होता हैं। आश्चर्य नहीं, गुरुत्व से ही पृथ्वी पर विकास हुआ हो। गुरुत्व से ही पृथ्वी ने सब कुछ थाम रखा हैं. 
गुरुत्व घटित होता हैं। बच्चा भी बहुत कुछ सीखा देता हैं गर आप और बच्चे के बीच मन नाम का बन्दर न हो। जहा वास्तविक प्यास होती हैं , वर्षा वही घुमड़ती हैं। 
ओशो कहते हैं: मूर्खता हैं गर आप गुरु को खोज रहे हो। कभी कोई शिष्य गुरु को नहीं खोज पाता। गुरु ही सही अवसर पर शिष्य के पास घटित होते हैं। 
सारी यात्रा होश की तरफ ले जाती हैं गर आप खोज रहे हो। नहीं तो एक गहरी आध्यात्मिक नींद में हम सब सो रहे हैं। स्वप्न देख रहे हैं , तितली के पीछे भागने का। ओशो कहते हैं: बहुत सम्भावना हो कि , तितली ही स्वप्न देख रही हो , आप के होने का।  गहरा और चौकाने वाला प्रश्न है।  चौक गए , समझाना सोये थे। यीशु से लेकर बुद्ध और ओशो इस नींद की बात कर रहे है। इसी नींद में सोये इंसान गुरुत्व की घटना से वंचित होते हैं , विरोध करते हैं, मार देते हैं और फिर तथागत को भगवान का रूप दे देते हैं। भगवान मतलब : वो इंसान जो हमें नींद से जगाता हैं , हमें अपने क्षुद्रता और काल्पनिक बेड़ियो से परिचय करवाता हैं, आजाद करवाता हैं. परंतु हम उन बेड़ियो और क्षुद्रता के इतने आदी हैं कि उस इंसान को मार के , पुनः अपने मानसिक जेल में आकर बेड़िया पहन लेते हैं। कालांतर में उसे किसी अवतार का रूप दे देते हैं। 
क्षुद्रता हमारा चुनाव हैं। भीड़ का चुनाव हैं। क्षुद्रता लोकतान्त्रिक हैं।   

पुराण कहते हैं : जगत विष्णु का स्वप्न हैं। आइस्टीन की रिलेटिविटी और पुराण के कथन , क्षितिज पर कही एक महीन धुंधलके में मिलते प्रतीत होते हैं। जागरण की यात्रा और विज्ञानं के तर्क सामानांतर चलते हैं और कही मिलते प्रतीत होते हैं। 
गुरुत्व सम्बन्ध हैं निराकार और निरूप से। जब उससे सम्बन्ध होता हैं , गुरुत्व घटित होता हैं। एक डाकू एक महान ग्रन्थ लिख डालता हैं।
गुरुत्व पॉजिटिव और नेगेटिव कणो के बीच सदा मौजूद न्यूट्रॉन हैं। वही योगी स्वरुप हैं। 
कृष्ण जिसे सत चित आनंद कहते है. 
सुख और दुःख के दो क्षोर के बीच, स्थितिप्रज्ञ।
उसे जानने की यात्रा जीवन हैं। 
बाकि सब माया !

आज इतना ही। 
राहुल